Thursday, October 6, 2011

समग्र ग्राम विकास – अंकुर को फलदार वृक्ष बनाने का प्रयास



भारत विकास परिषद एक गैर सरकारी सामाजिक संस्‍था है। संस्‍था के लगभग एक लाख सदस्‍य है। संस्‍था इन्‍हीं सदस्‍यों के आर्थिक सहयोग से अपने विभिन्‍न प्रकल्‍प संचालित करती है। संस्‍था दो प्रकार के कार्य प्रमुखता से करती है। एक सेवा कार्य और दूसरा संस्‍कार कार्य। हम शहरवासी या सम्‍पन्‍न और प्रबुद्ध वर्ग को सेवा के लिए संस्‍कारित एवं प्रेरित करते हैं। इस कारण हमारे अधिकतर प्रकल्‍प शहरों में संचालित हैं। लेकिन समग्र ग्राम विकास प्रकल्‍प के अन्‍तर्गत हमने ऐसे ग्रामों का चयन किया हैं जहाँ आज भी आधुनिक सुविधाएं नाममात्र को भी नहीं है। देश भर में वर्तमान में 17 गाँवों का चयन कर उन्‍हें समग्र विकास के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है।
ये सारे ही गाँव शहरी आबादी से दूर, सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। उदयपुर से चालीस किलोमीटर दूर ऐसे ही एक गाँव को भी इस योजना के अन्‍तर्गत गोद लिया गया है। गाँव का नाम है कालीवास। स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, स्‍वच्‍छता, आर्थिक विकास आदि को प्राथमिकता प्रदान करते हुए एक टीम इस कार्य हेतु लगी हुई है। मेरा भी इस गाँव में दो-तीन बार जाना हुआ। अभी 1 अक्‍तूबर को ही समग्र विकास में लगे लोगों की टीम ने वहाँ एक कार्यक्रम रखा था। मेरे पास भी चलने का निमन्‍त्रण था तो मैंने निमंत्रण पाते ही उसे लपक लिया। क्‍योंकि मेरा प्रथम प्रेम ये वनांचल ही हैं। जब भी अवसर मिलता है, मैं वहाँ जाने से नहीं चूकती हूँ।
कालीवास जाने का रास्‍ता बहुत ही मनोरम है। चारों तरफ पहाड़ हैं और इन्‍हीं पहाड़ों के मध्‍य से सड़क मार्ग बनाया हुआ है। अभी वर्षाकाल बीता ही है तो हरियाली चारों तरफ छायी हुई है। पहले यहाँ घने जंगल हुआ करते थे लेकिन सरकारी अदूरदर्शिता के कारण अब जंगल इतने घने नहीं रह गए हैं। वनवासी के जीवन का आधार कृषि है। मैदानी क्षेत्र सीमित है और पहाड़ों पर ही उनके खेत हैं। छोटे-छोटे, आधा बीघा, दो बीधा और बहुत हुआ तो चार बीघा बस। खेतों के साथ ही उनके झोपड़े बने हैं। गाय, बकरी, मुर्गी अधिकतर झोपड़े के बाहर दिखायी दे जाएंगी। वनवासी दिनभर खेती करता है या फिर मजदूरी लेकिन शाम होते ही उसके पैर थिरकने लगते हैं। हाँ एक बात अवश्‍य अखरती है कि शाम को जैसे ही वनवासी अपनी घर की ओर आता है, तो उसके पैर लड़खड़ा रहे होते हैं। गम भुलाते हैं या मर्दो की परम्‍परा निभाते हैं, कहा नहीं जा सकता।
खैर हम वहाँ हवन कराने के निमित्त से गए थे। वहाँ के एक मन्दिर के प्रांगण में ही हवन का आयोजन था। स्‍थानीय देवता के रूप में वनवासी क्षेत्र में सर्प को पूजा जाता है साथ ही भैरव देवता की भी पूजा होती है।  लेकिन कालीवास ही शायद ऐसा गाँव है जहाँ धरती माता का मन्दिर है। दोपहर का समय होने के कारण बड़ी संख्‍या में ग्रामवासी तो नहीं थे लेकिन महिला, पुरुष और बच्‍चे पर्याप्‍त संख्‍या में थे। हमने हवन हेतु गायत्री परिवार का सहयोग लिया था और उनके कार्यकर्ता ने बड़े ही मनोयोग से यज्ञ सम्‍पादित किया। आदिवासियों को जोड़े के साथ हवन कराया।



व़हाँ चार सिलाई केन्‍द्र भी संचालित हैं। मुझे सुखद आश्‍चर्य तब हुआ जब विदित हुआ कि कुछ महिलाएं प्रतिदिन का एक हजार रूपया तक सिलाई केन्‍द्र के माध्‍यम से कमाने लगी हैं। परिषद ने एक कार्य बहुत अच्‍छा किया, विगत दो वर्षों में 100 कुएं गहरे कराए। पहाड़ों और झरनों के मध्‍य बसे इस गाँव में भी पानी बहकर शहर चले जाता है। अकाल की स्थिति में कुएं सूख जाते हैं तो कुएं गहरे होते ही अब ये पानी से लबालब हो गए हैं और वहाँ का किसान आराम से दो-तीन फसल तक ले लेता है। परिवर्तन का प्रारम्‍भ है, लेकिन वास्‍तविक परिवर्तन तब होगा जब वनवासी अपने विकास के लिए स्‍वयं जागरूक हो जाएगा। हमारा यही प्रयास है। 

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी प्रस्तुति ||
    शुभ विजया ||

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  2. ऐसे कार्य भारत की गरीबी दूर कर सकते हैं॥

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  3. बहुत ही सार्थक प्रयास है।

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  4. लाख अच्छी बातें कहने से एक अच्छा काम करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। परिषद का का यह प्रयास बहुत अच्छा लगा।
    हार्दिक शुभकामनायें।

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  5. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।
    मेरा शौक
    मेरे पोस्ट में आपका इंतजार है,
    आज रिश्ता सब का पैसे से

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  6. सार्थक, सुन्दर व बेहतरीन प्रस्तुती ,

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  7. सौदेश्य कसावदार रिपोर्ताज .

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  8. This comment has been removed by the author.

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  9. सुंदर रिपोर्ताज़

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